बुद्धकालीन सोलह महाजनपदों का परिचय दें।
Q. 3. Discuss the political condition of India in the sixth Century B.C. (छठी शताब्दी ई. पू. में भारत की राजनीतिक दशा का वर्णन करें।) Or. Discuss the sixteen Mahajanapadas of 6th century B.C.अथवा (बुद्धकालीन सोलह महाजनपदों का परिचय दें।)
Ans. छठी शताब्दी ई. पू. में उत्तरी भारत की राजनीतिक अवस्था में उत्तरोत्तर उन्नति हो रही थी। वैदिककाल में कबीलों या जनों का महत्व था। उत्तर वैदिककाल में प्रादेशिक राज्यों की स्थापना का काम हुआ था और ई पूर्व छठी शताब्दी में कई महाजनपदों की स्थापना हुई। इसका वर्णन हमें बौद्ध और जैन धर्मग्रन्थों में मिलता है। बौद्ध धर्म ग्रन्थ अंगुत्तर निकाय में अंग, मगध, काशी, कोशल, बज्जि, मल्ल, चेदि, वत्स, कुरु, पांचाल, मत्स्य, शूरसेन, अस्मक, अवति, गांधार और कंबोज का वर्णन मिलता है। जैन धर्मग्रन्थ भगवती सूत्र में अंग, बंग, मगध, मलय, मालव, अच्छ, बच्छ, कच्छ, पाध, लाध, वज्जि, मोलि, काशी, कोशल, अवाह और सम्मुतर का वर्णन मिलता है। इन दोनों सूचियों में अंग, मगध, वत्स, बज्जि, काशी और कोशल का नाम समान रूप से मिलता है। इस संदर्भ में अंगुत्तर निकाय द्वारा प्रदत्त सूची को ही ज्यादा प्रामाणिक माना गया है, क्योंकि इसमें समकालीनता की झलक अधिक है। बौद्ध साहित्य में दस गणराज्यों का भी उल्लेख मिलता है। ये गणराज्य थे-कपिलवस्तु के शाक्य, रामग्राम के कोलिय, पावा के मल्ल, कुशीनारा के. मल्ल, मिथिला के विदेह, पिप्पलीवन के मोरिय, सुंसुमार पर्वत के भग्ग, अल्कप्प के बुलि से सुपुत्र के कलाम और वैशाली के लिच्छवि। कहने का तात्पर्य यह है कि उत्तरी भारत कई महाजनपदों और गणराज्यों में विभाजित था।
सोलह महाजनपद
1. अंग-अंग मगध के पूर्व में स्थित था। इसकी राजधानी चंपानगरी में थी, जो सभ्यता और संस्कृति का केंद्र था। चम्पानगरी एक व्यापारिक नगर के रूप में मशहूर था। विधुर पंडित जातक के अनुसार राजगृह भी अंग का ही नगर था। अंग का मगध से बराबर संघर्ष होता रहता था। बाद में मगध की साम्राज्यवादी प्रवृत्ति का शिकार होकर उसे अपनी स्वतंत्रता खोनी पड़ी।
2. मगध- छठी शताब्दी ई. पूर्व में मगध एक शक्तिशाली राज्य था। इसकी राजधानी राजगृह में थी। वृहद्रथ और जरासंध यहाँ के प्रमुख राजा हो चुके थे। ये प्राग्बुद्ध काल के शासक थे। मगध साम्राज्यवादी नीति में विश्वास रखता था। इसने अंग पर अधिकार भी कर लिया था।
3. काशी- काशी की राजधानी वाराणसी थी। यह वरुणा और असी नदियों के संगम पर बसा हुआ था। बारह योजनों में फैला यह नगर भारत के सर्वश्रेष्ठ नगरों में से था। महावग्ग में इसके वैभव का उल्लेख सुंदर ढंग से किया गया है। कोशल के साथ राजनीतिक प्रभुता के लिए इसकी लड़ाई होती रहती थी।
4. कोशल- यह राज्य काशी के उत्तर में स्थित था। इसके विस्तार का क्षेत्र उत्तर प्रदेश का मध्य भाग था। इसकी राजधानी श्रावस्ती में थी। इस समय तक इसकी पहली राजधानी अयोध्या का महत्व कम हो चुका था। इसका काशी के साथ बराबर संघर्ष होता रहता था। इसने काशी को जीतकर अपने साम्राज्य का विस्तार किया था। आगे चलकर मगध के शासक अजातशत्रु ने कौशल को जीतकर मगध में मिला लिया।
5. बृज्जि - बृज्जि आठ राज्यों का संघ था जिसमें लिच्छवि, विदेह और ज्ञात्रिक विशेष महत्त्वपूर्ण थे। यहाँ गणतंत्रीय शासन पद्धति थी। इसकी राजधानी वैशाली में थी । वैशाली सभ्यता और संस्कृति का केन्द्र था। इस संघ की स्वतंत्रता पर भी मगध ने ही आघात पहुँचाया था।
6. मल्ल - मल्ल भी एक महत्वपूर्ण गणराज्य था। यह वृज्जि के पश्चिम और कोशल के पूर्व में स्थित था । यह दो शाखाओं में विभक्त था। एक पावा के मल्ल के नाम से जाने जाते थे, दूसरा कुशीनगर के मल्ल के नाम से जाने जाते थे। इनका उल्लेख महाभारत में भी मिलता है।
7. चेदि-चेदि नामक राज्य यमुना के दक्षिण में स्थित था तथा इसकी राजधानी शक्तिमती थी । शिशुपाल चेदि का ही राजा था।
8. वत्स - वत्स नामक राज्य यमुना के उत्तर में तथा काशी से पश्चिम स्थित था। इसकी राजधानी कौशाम्बी में थी। व्यापारिक मार्ग पर स्थित होने की वजह से इसका काफी महत्व था ।
9. कुरु - आधुनिक दिल्ली और मेरठ के समीप कुरु नामक महाजनपद स्थित था। इसकी राजधानी इन्द्रप्रस्थ में थी। प्रारंभ में यहाँ राजतंत्रात्मक शासन व्यवस्था थी, किन्तु बाद में यहाँ गणतंत्र की स्थापना हुई। एक जातक के अनुसार, इसमें 300 के लगभग संघ थे। जातकों में यहाँ के राजाओं का विवरण मिलता है। इसमें सुतसोम, कौरव एवं धनंजय का नाम उल्लेखनीय है।
10. पांचाल - पांचाल महाजनपद कुरु के पूर्व और दक्षिण में स्थित था। गंगा नदी के द्वारा यह दो भागों में बाँट दिया गया था। उत्तरी पांचाल की राजधानी अहिछत्र और दक्षिण पांचाल की राजधानी काम्पिल्य नगर में थी। यहाँ भी कुरु की तरह ही राजतंत्र और बाद में गणतंत्र की स्थापना हुई थीं। चुलानी ब्रह्मदत्त पांचालों का एक महान शासक था।
11. मत्स्य-मत्स्य नामक महाजनपद द्विपद्वती नदी के दक्षिण में स्थित था। इसकी राजधानी विराटनगरी थी। इस पर पहले चंदियों ने और बाद में मगध ने अधिकार कर लिया था।
12. शूरसेन - शूरसेन का राज्य कुरु के दक्षिण और यमुना के किनारे था। इसकी राजधानी मधुरा थी। यहाँ पहले गणतंत्र, फिर राजतंत्र की स्थापना हुई थी। यहाँ यादवों का शासन था।
13. अस्मक - यह जनपद गोदावरी नदी के दक्षिण में स्थित था तथा इसकी राजधानी पोतन थी। इक्ष्वाकु वंश के राजाओं का यहाँ शासन था। अवन्ति के साथ संघर्ष में इसने अपनी स्वतंत्रता गँवा दी।
14. अवन्ति-विन्ध्य पर्वत के उत्तर में यह एक शक्तिशाली राज्य था जो उत्तर और दक्षिण भारत के बीच कड़ी का काम करता था। यह भी दो भागों उत्तरी और दक्षिणी अवन्ति में बँटा हुआ था। उत्तरी अवन्ति की राजधानी उज्जयनी और दक्षिणी अवन्ति की राजधानी महिष्मती थी। इसका विस्तार क्षेत्र आधुनिक मालवा प्रांत था।
15. गांधार - गांधार नामक जनपद आधुनिक अफगानिस्तान में सिंधु नदी के किनारे स्थित था। इसकी राजधानी तक्षशिला थी। इसका अवन्ति और मगध से शत्रुतापूर्ण संबंध था। इसको प्रसिद्धि का कारण तक्षशिला स्थित विश्वविद्यालय था।
16. कंबोज - गांधार के उत्तर-पश्चिम में कंबोज नामक महाजनपद स्थित था। इसको राजधानी हाटक या राजपुर थी। संभवतः द्वारका भी इसी राज्य के अंतर्गत स्थित था।
अन्य छोटे राज्य
अंगुत्तर निकाय में वर्णित इन महाजनपदों के अलावा के भटक शिवि अम्बष्ठ, सौबीर आदि राज्य भी थे, लेकिन ये बहुत छोटे थे और साम्राज्यवादी ताकतों के बीच महत्वहीन थे।
दस गणराज्य-सोलह महाजनपदों के अलावा पालि ग्रंथों में दस गणराज्यों का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है। इनमें से कुछ का उल्लेख तो सोलह महाजनपदों के अंतर्गत भी है। इन राज्यों में वंश-परम्परा के अनुसार कोई राजा नहीं होता था, बल्कि प्रजा द्वारा निर्वाचित व्यक्ति शासन की प्रमुख होता था। इन दसों गणराज्यों का विवरण नीचे प्रस्तुत है-
1. कपिलवस्तु के शाक्य - यह नेपाल की तराई में स्थित था। यहाँ के शासन के प्रधान शुद्धोधन थे जो बुद्ध के पिता थे। उनका शासन 500 सदस्यों वाली परिषद् की सहायता से चलता था।
2. रामग्राम के कोलिय - कपिलवस्तु के पूर्व में कोलिय लोगों का राज्य था। इनका शाक्यों से बराबर संघर्ष होता रहता था।
3. पावा के मल्ल - यह उत्तर प्रदेश के गोरखपुर के समीप स्थित था। इसकी राजधानी पावा में थी। यहीं संभवतः महावीर का देहांत हुआ था।
4. कुशीनारा के मल्ल - यह भी उत्तर प्रदेश में ही था और बुद्ध का परिनिर्वाण संभवतः यहीं हुआ था।
5. मिथिला के विदेह-विदेहों का राज्य एक अराजक गणराज्य था। जहाँ जनक जैसे ख्याति प्राप्त राजा हुए थे।
6. पिप्पलीवन के मोरिय-यहाँ शक्तियों की ही एक शाखा राज्य करती थी। मोरों की अधिकता के कारण यहाँ के लोगों को मोरिय के नाम से जाना जाता था।
7. सुमेर पर्वत के भग्ग - यहाँ ब्राह्मणों का शासन था। इनका राज्य उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर के नजदीक था। इनका उल्लेख ऐतरेय ब्राह्मण में भी मिलता है।
8. अलकप्प के बुलि - बुलि लोगों का राज्य बिहार के आधुनिक मुजफ्फरपुर और शाहाबाद के नजदीक कहीं था।
9. केसपुत्र के कलाम- इसका वर्णन हमें शतपथ ब्राह्मण और जातक ग्रंथों में मिलता है। बुद्ध के गुरु आलार कलाम यहीं के रहनेवाले थे।
10. वैशाली के लिच्छवि-लिच्छवियों का यह गणराज्य था और इसको राजधानी वैशाली में थी। वैशाली एक वैभवशाली नगर था। अजातशत्रु के समय में मगध के द्वारा इसकी स्वतंत्रता छीन ली गयी थी। आम्रपाली यहाँ की नगरवधू एवं नर्तकी थी जो बाद में बुद्ध के सम्पर्क में आकर भिक्षुणी बन गयी थी।
राजनीतिक प्रवृत्तियाँ
'उपरोक्त बातों को देखने से हमें उस समय की विभिन्न राजनीतिक प्रवृत्तियों का पता चलता है, जो निम्नलिखित हैं-
1. विकेन्द्रीकरण की भावना - ई० पूर्व छठी शताब्दी में संपूर्ण भारत कई भागों में विभाजित था। बौद्ध और जैन धर्म ग्रंथों के अनुसार भारत सोलह महाजनपदों में विभाजित था। इसके अलावा भी कुछ छोटे-छोटे राज्यों का पता हमें अन्य स्रोतों से चलता है, जिनमें केकय, मुद्रक, त्रिगर्त, यौधेय आदि प्रमुख थे। कहने का तात्पर्य यह है कि भारत में विकेन्द्रीकरण की भावना काम कर रही थी।
2. शासन की पद्धतियाँ - उपरोक्त राज्यों के अध्ययन से पता चलता है कि इस काल में दो तरह की शासन पद्धतियाँ प्रचलित थीं। कोशल, मगध, वत्स एवं अवन्ति उस समय के प्रमुख राजतन्त्र थे। बृज्जि, मल्ल, कपिलवस्तु, मिथिला आदि में गणतंत्रीय पद्धति का बोलबाला था। लेकिन राजतंत्रीय एवं गणतंत्रीय दोनों ही शासन पद्धतियाँ प्रचलित थीं।
3. परिवर्तनशील शासन पद्धति- इस संदर्भ में एक बात और प्रकाश में आती है। वह यह कि समय के अंतराल में किसी-किसी महाजनपद में शासन-पद्धति में परिवर्तन भी होता रहता था। उदाहरणस्वरूप कुरु और पांचाल में राजतंत्रीय व्यवस्था के बाद गणतंत्र की स्थापना हुई थी; जबकि शूरसेन में गणतंत्र की कब्र पर राजतंत्र की स्थापना हुई। यह समय के मुताबिक राजाओं की मानसिकता में होनेवाले परिवर्तनों को बतलाया है।
4. साम्राज्यवादी भावना का विकास-उपरोक्त विवरणों से यह भी पता चलता है कि छठी शताब्दी ई. पू. राजनीतिक दृष्टिकोण से उथल-पुथल का समय था। एक जनपद दूसरे जनपद के साथ संघर्ष करता था। विजय और विस्तार की लालसा में महाजनपदों के बीच होनेवाला यह संघर्ष उस समय के राजनीतिक जीवन की एक महत्वपूर्ण विशेषता थी। कहने का तात्पर्य यह है कि साम्राज्यवाद की भावना का विकास हो रहा है।
संक्षेप में हम कह सकते हैं कि ई० पूर्व छठी शताब्दी में भारत कई महाजनपदों में विभक्त था जिनमें अलग-अलग शासन पद्धतियों की स्थापना हुई थी।